⚠️ यह साइट निर्माणाधीन है — बीटा संस्करण

दशकों बाद ऊपरी गंगा में लौटी हिल्सा मछली

नई दिल्ली। दशकों तक ऊपरी गंगा से लगभग गायब रही प्रतिष्ठित हिल्सा मछली ने वापसी की है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के टांडा खुर्द गांव के पास हिल्सा मिलने को गंगा की पारिस्थितिकी, जलीय जैव विविधता और नदी पर निर्भर मछुआरा समुदायों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

ऐतिहासिक रूप से हिल्सा बंगाल की खाड़ी से गंगा नदी के रास्ते वाराणसी, प्रयागराज और उससे आगे तक प्रवास करती थी। हालांकि, 1975 में फरक्का बैराज के चालू होने के बाद इसके प्रवासी मार्ग में गंभीर बाधा आई और मध्य एवं ऊपरी गंगा में हिल्सा की संख्या में भारी गिरावट हुई।

भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र ने बुधवार को जानकारी दी कि हिल्सा के संरक्षण और पुनर्वास के लिए आई सी ए आर -केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान , बैरकपुर और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने 2019 से दीर्घकालिक कार्यक्रम शुरू किया। जून 2026 तक इस अभियान के तहत 3.85 लाख से अधिक किशोर और वयस्क हिल्सा नदी में छोड़ी गईं। इसके साथ 40 लाख से अधिक निषेचित अंडे गंगा में छोड़े गए।

केंद्र ने बताया कि लगभग 9.4 लाख हैचरी-उत्पादित स्पॉन छोड़े गए। मछलियों की टैगिंग, निगरानी और प्रवास का अध्ययन किया गया। कृत्रिम प्रजनन और स्टॉक संवर्धन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। अनुसंधान केंद्र के मुताबिक 2023 से 2025 के दौरान निगरानी में छोड़ी गई हिल्सा को मिर्जापुर तक ऊपर की ओर जाते हुए दर्ज किया गया था। अब चंदौली जिले में दो हिल्सा मिलने से इसके ऐतिहासिक प्रवास क्षेत्र की बहाली के संकेत और मजबूत हुए हैं। दोनों मछलियों का कुल वजन 740 ग्राम बताया गया है।

उल्लेखनीय है कि हिल्सा एक संवेदनशील प्रवासी प्रजाति है। इसलिए इसकी ऊपरी गंगा में मौजूदगी नदी में जल-जुड़ाव, आवास की गुणवत्ता और पारिस्थितिक स्थिति में सुधार का महत्वपूर्ण जैविक संकेत मानी जा रही है।

आईसीएआर-सीआईएफआरआई के निदेशक डॉ. प्रदीप डे ने कहा कि मत्स्य संसाधनों की बहाली को व्यापक पारिस्थितिक पुनर्बहाली और टिकाऊ आजीविका का हिस्सा माना जाना चाहिए। इसके लिए मछलियों के प्रवास, नदी के आवास, जैव विविधता, जल प्रबंधन और मछुआरा समुदायों की जरूरतों को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी है।

हिल्सा की वापसी से नदी पर निर्भर समुदायों के लिए मछली की उपलब्धता और आजीविका के अवसर बढ़ने की उम्मीद है। साथ ही, यह उपलब्धि गंगा में अन्य देशी और प्रवासी जलीय प्रजातियों की बहाली के लिए भी एक मॉडल बन सकती है।

Add a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सबसे महत्वपूर्ण खबरों से अपडेट रहें

सब्सक्राइब बटन दबाकर, आप पुष्टि करते हैं कि आपने हमारी गोपनीयता नीति और उपयोग की शर्तें पढ़ी हैं और सहमत हैं गोपनीयता नीति and उपयोग की शर्तें